आशा और निराशा

आशा और निराशा


बैठ गया क्या पथिक हार कर ।
हार गया यह खुद ही मान कर।।

रोड़े तुझे गिराएंगे,
गति में अवरोध लगायेगे ,
तू जब जब उठना चाहेगा,
तब तब तुझे गिराएंगे

सरिता को रुकते देखा क्या,
पर्वत को झुकते देखा क्या,
क्या सूर्य कभी थम जाता है
क्या समय कभी जम जाता है

बैठ गया क्या...... हर गया यह......

लोगों की मंशा जन ले ,
आगे बढना है ठान ले,
फिर से में उत्साह फेंक ,
तू ही अव्वल है मान ले।

आधा रण उसने जीत लिया,
अड़चन की जिसने मीत किया,
प्रहरी को दबा के एक पग में ,
अब नाम कमा ले इस जग में।।

बैठ गया क्या...... हर गया यह......।

— Aman Dwivedi