बचपन से बड़प्पन की राह

बचपन से बड़प्पन की राह

आसान नही यहाँ बड़प्पन के दौर से गुजरना ।

सामना करना पड़ता हैं कई अनजान जोखिमों का

कहानियाँ तो कई सुनाई जाती हैं इस दिलचस्प "बड़प्पन" की

पाकर इस मुकाम को भी छोड़ आते हैं हम वो मासूम सा बचपन

दिवाली हो या हो ईद, मगर कहाँ अब वो हर्ष उल्लास रहा ।

सांसे चलती है जरूर, मगर सब ठहरा सा मालूम होता है ये कई जिम्मेदारियों का बोझ है साहब,

यहाँ सब फीका नज़र आता हैं ।

आज भी अगर मौजूद रहते हैं उन हसती खेलती चीखों कै बीच ।

तो धीमे से उत्साह को छुपा देते हैं बड़ी खामोशी से ये बड़प्पन का असर जनाब अच्छे अच्छो को

जीना होता है इस अंदाज़ से ।

अब कहाँ वो हर पल जी भर के जीना होता हैं यहाँ तो जीना ही पल भर सा महसूस होता है

अब कहाँ वो जीने के हल्के उसूल होते है ।

ये बड़प्पन है साहब यहाँ अपनी खुशी छोड़ दूजे में ढूढते हैं ।

मगर क्या कहें गुजरना है इस राह से, चुकानी है पाई-पाई ।

हर उस शक्श को, की है जिसने बेफिक्र-ए-बचपन की कमाई।

—Deepika Negi