बदलता वक्त

बदलता वक्त

कुछ इस तरह बदल रहा है वक्त की...

आंगन की धूप, बुजुर्गों के किस्से गुजरे दौर हो रहे हैं||

जब भी बाग में टहलो संभलकर ज़रा ऐ दोस्त|

मुस्कुराते फूल भी अब शुल चुभो रहे हैं||

सुकून के लिए कभी बैठ जाती थी मंदिर में, कभी दरगाह में कुछ देर|

अब तो मंदिर के भजन, मस्जि़द की अज़ान भी शोर हो रहे हैं||

अंधेरा है हर ओर, मत उम्मीदें करो चिरागों से|

देहरी में रखें दिपक भी तिमिर संग सो रहे हैं||

तपती धरती को ठंडक देता था बरसता सावन|

अब तो देखा है बादल भी खुद झुलस रहे हैं||

बहता था दरिया उमड़-उमड़ कर, नदियों में मीठा पानी|

अब तो सागर भी बुंद-बुंद को तरस रहे हैं||

गुज़रते जिधर से भी लोग, रास्ते मंजिल दिखाते थे|

अब तो खुद रास्ते भी मंजिल की तलाश में खो रहे हैं||

कलम ऐसी थी उस दौर में, कागज़ पे चलते ही शोर मचाती|

अब तो शब्द भी मौन हो रहें हैं, शब्द भी मौन हो रहें हैं||

—Anshika Gupta