बेजुबान शायद यही सोचता है
न कोई घर,
न कोई ठिकाना होता है,
जहाँ आँखे बंद हो,
बस वही हाथो का सिरहाना होता है,
किसी के लिए मासूमियत से रिझाने वाला,
तो किसी के लिए आवारा जानवर होता है,
गलियों मे भटककर,
अपने जीने का वो साधन ढूंढे,
कब कही से कोई कुछ खिला दे,
उस नुक्कड़ पे बैठे वो शायद यही सोचे,
ख्वाहिशे बेजुबानो की भी पुरी होती है,
कुछ बिस्कुट या रोटी से,
उसकी भुख पुरी होती है,
शायद इंसान के व्यवहार से परिचित नही है वो,
तभी कि हुई मदद का एहसान वो साथ रहकर चुकता है,
कभी कोई यहाँ से भगाता,
तो कोई बेवजह मरता है,
कुछ सिसकियाँ भर वो वहाँ से चला जाता है,
ठंड मे ठिठुरता वो,
बचने का उपाये खोजता है,
बस जल्द से जल्द सबेरा हो जाए,
बशायद यही सोचता है,
भावनाएं निस्वार्थ जोड़ लेता है,
वो सबसे इसलिए शायद,
जुबां का पक्का इंसान भी एक समय,
साथ छोड़ देता है,
मगर वो साथ देता है,
एक नजर मे दोस्त बन सकता,
तो खतरा भी पहचानने का हुनर रखता है,
बड़ी बेदर्द है दुनिया बचने के लिए ,
गुर्राना भी पड़ता है,
कहानियों मे मसहूर दोस्ती के किस्से,
हकीकत मे भी देखने को मिलते है,
लाखों मुश्किलों से जूझ कर भी,
वफादारी न भुलते,
दोस्ती को ही शायद जिदंगी समझते है,
ठेस पहुँचती है इन्हें भी,
अक्सर दुखी हो जाया करते है,
जब चलती गाडिय़ों टकराकर,
तो कभी ठंड मे ठिठुराकर रह जाते है,
बस वो एक जगह बैठकर,
एक टकी निहारते है,
कोई तो होगा बचाने को इस ठंड,
या ठोकर से शायद यही सोचे जाते है|
—Ayushi Singh