दर्ज
मेरे मन में अपनी उपस्थिति तुम कुछ यूं दर्ज करा रहे हो,
हाथों में मैंने थामा है इस कलम को ,
इस कलम में जज़्बात की स्याही तुम बनते जा रहे हो ,
जिंदगी के सफ़र में एक मोड़ पर आकर यूं मिले हो ,
सुनो पूछना तो है मुझे ये बात तुमको ,
मंजिल तक साथ हो मेरे या मुसाफिर तो कहीं तुम नहीं हो ,
दर्जा दे रहे हो मुझे इतना की शोभा मुझे अपनी कह रहे हो,
मेरी इन बातों का तुम अब यकीन करो ,
मेरे मन में अपनी उपस्थिति तुम कुछ यूं दर्ज करा रहे हो ।
—Prabhjeet Kaur Siddhu