घबरा जाती हूँ

घबरा जाती हूँ

मुश्किलें हल हो जाती है,

पर कभी-कभी घबरा जाती हूँ,

दिल की बात बोलने मे देर न करती,

पर कभी-कभी खामोश रह जाती हूँ,

अपने करीबियों से भी डर लगता कभी,

उनसे भी कुछ कहने मे हिचकिचाती हुँ,

यूँ तो बिना सुने हर परेशानी समझ जाती हूँ,

पर कभी-कभी अपनी तकलीफे समझा नही पाती हुँ,

तारों की तरह उलझे है शब्द मेरे,

कोई कोर पकड़ नही पाएगा,

एक लम्बी सांस भर,

फिर मुस्कुराती हुँ,

पर कभी कभी-कभी मै भी घबराती हुँ,

परवाह नही की कोई क्या कहेगा,

दुनिया के बेतुके सवाल छोड़,

सही राह मे बढ़ना चाहती हूँ,

पर कुछ सवाल है जिनसे,

सहम सी जाती हूँ,

कभी-कभी मै भी घबराती हुँ,

उपलब्धिया हर जगह है,

खुद से उन्हें चुनना चाहती हुँ,

पिंजरे से आज़ाद पंछी हुआ है,

उसी तरह उड़ान भरना चाहती हूँ,

पर कभी-कभी घबराती हुँ|

—Ayushi Singh