जब अमन चाय से मिला

जब अमन चाय से मिला


मिलना तय हुआ हमारा रहीम चाचा की टपरी पर। मैं बैठा था कुर्सी पर एक कोने में, वो उबल रही थी धीमी आँच पर, या यूँ कहो वो सवंर रही थी हमसे मिलने के लिए। बेचैनी इधर भी थी तो कुछ उसको भी होगी।

वो आई, रंग सावला, मिजाज कड़क और लहजा एक दम मीठा और वो इतनी बाकमाल होती भी क्यों नही, ज़िन्दगी को धीमी आँच पर उबालिए, निखर कर सामने आएगी। बोलती थोड़ी कम है वो या शायद अजनबी के सामने थोड़ी शर्माती है।

मुझे तो वो पहली मुलाकात में ही पसन्द आ गई थी वो, मगर उसे थोड़ा वक्त चाइए था। एक बात बड़ी प्यारी थी उसमें, मैं जब भी उससे मिलने जाता था वो तब तब मुझसे मिलने आ जाया करती थी,उसी अंदाज में, मिज़ाज कड़क और लहजा मीठा। फिर हर रोज़ शाम को हमारी मुलाक़ात होने लगी, मैंने अपने दोस्तों से भी मिलाया उसे, सबको बहुत पसंद थी वो।

एक रोज़ जब में उसे सुबह मिलने गया तो वो वहाँ मिली नही, आस पास से पता किया तो पता चला कि उसके अब्बा रहीम चाचा की तबियत ठीक नही है और वो पास के किसी अस्पताल में भर्ती है, मैं मिलने जाना चाहता था मगर जा नही पाया। कुछ दिनों बाद पता चला कि रहीम चाचा अब नही रहे।

उस दिन के बाद फिर वो मुझसे कभी मिली ही नही, बड़ा याद आता है उसका सावला रंग, उसका मेरे लिए यूँ सवरना, शाम को उससे बातें करना, उसकी वो खुशबू जिससे सारी गली महक उठती थी। बस.... यहीं तक थी रहीम चाचा की चाय और इस अमन की कहानी।

वो मुसलमान की चाय,

मैं हिन्दू का लड़का,

रिश्ता कुछ इंटरकास्ट था।

—Aman Gupta