खराब वक़्त
कफ़न ओढ़े हुए हैं
दुनिया काफ़ी दिनों से
कुछ मासूम बच्चों की
खिलखिलाहट-ए-आवाज़ों के साथ।
चाँद का भी वो
आख़िरी नहाना,
मुर्दा सूरज का वो दफ़्नाना,
तारों का ख़ुदी में मर जाना
दिखाई तो दे रहा है
लेकिन ये धुँधली रात।
कब्रें खोदे जा रहे हैं बग़ीचों में
गुलिस्तान भी अब चल
पड़ा है उसी राह पे,
सड़कों से लाल नदी
जब पहुँचेंगी वहाँ
सुनेहरी होगी इन
दरख़्तों की हवा।
शायद इसी तरह क़ुर्बान होगा ये जहाँ आबाद,
कुछ ही वक़्त की बात है !
शायद इसी तरह होगा ये जहाँ का इंसाफ़।