मेरी दोस्त

मेरी दोस्त

एक दोस्त है मेरी,

थोड़ी खोई-खोई सी रहती है,

कम बोलती है, ज़्यादा हँसती है।

कभी-कभी चुप-चुप सी रहती है,

और कभी-कभी इतना बोलती है

कि चुप ही नहीं रहती।


न जाने कौन से राज़ छुपाए बैठी है,

न जाने कौन से ग़म दबाए बैठी है।

इतनी चीज़ें समेटे बैठी है,

कभी-कभी आँखें नम कर बैठती है।


दोस्त कम बनाती है,

लेकिन जब बनाती है

तो बहुत संभाल कर रखती है।

हर ग़म का जवाब

मुस्कान से देती है।


कभी-कभी बिखर जाती है,

पर खुद को

ज़रा-ज़रा समेट भी लेती है।


एक दोस्त है मेरी,

जो किताब-सी गहरी है…