प्रकृति में मैं
प्रकृति में मैं
और मैं ही प्रकृति में समाई हूँ।
जिस्म से लेकर जान और रूह भी, मारुत में मिलाई हूँ।
साँसों संग धड़कनों को भी
श्रृंखला सा सजाई हूँ।
प्रकृति में मैं
और मैं ही प्रकृति में समाई हूँ।
भूत, भविष्य और वर्तमान,
हर समय, हर काल का ज्ञान पाई हूँ।
पानी सा साफ़ मन और अग्नि सी चेतना पाई हूँ।
हर स्पर्श में प्रकृति को ही अपनाई हूँ।
प्रकृति में मैं
और मैं ही प्रकृति में समाई हूँ।